बोन टेस्ट रिपोर्ट ने खोली यूपीसीए के उम्र निर्धारण की पोल, एक साल में किसी की उम्र बढ़ी सिर्फ दो महीने तो किसी के आंकड़े रहे जस के तस!

 

 

  • अंडर-16 क्रिकेटरों की बोन एज रिपोर्ट में सामने आया अंतर, पिछले साल और इस बार के आंकड़ों ने उठाए जांच प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल
  • पिछले साल मशीनों से जांच, इस बार कंसल्टेंट की भूमिका; रिपोर्ट में अंतर को लेकर स्पष्ट जवाब का इंतजार**
  • अलग-अलग रिपोर्ट में उम्र के आंकड़ों में अंतर, पारदर्शिता पर सवालों के बीच यूपीसीए पदाधिकारियों की चुप्पी

 

भूपेंद्र।

कानपुर, 22 अक्टूबर। उत्तर प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन (यूपीसीए) में जूनियर क्रिकेटरों की उम्र निर्धारण प्रक्रिया एक बार फिर सवालों के घेरे में है। अंडर-16 खिलाड़ियों की बोन एज टेस्ट रिपोर्ट में पिछले साल और इस बार के आंकड़ों के बीच सामने आए अंतर ने जांच के मानकों और उनकी विश्वसनीयता को लेकर नई बहस छेड़ दी है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, कुछ खिलाड़ियों की बोन एज रेटिंग में करीब एक साल के अंतराल के बावजूद बेहद मामूली बदलाव दर्ज हुआ है, जबकि कुछ खिलाड़ियों के मामले में अलग-अलग रिपोर्ट में उम्र के आंकड़े अलग नजर आ रहे हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर उम्र निर्धारण की प्रक्रिया किस आधार पर संचालित हो रही है और इन अंतरों की समीक्षा कौन कर रहा है?

एक साल में महज दो महीने का अंतर

उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक, आयांश सान की बोन एज रेटिंग पिछले साल 15.7 वर्ष बताई गई थी, जबकि इस साल यह 15.9 वर्ष दर्ज होने की बात सामने आई है। यानी लगभग 12 महीने के अंतराल में रिपोर्ट की रेटिंग में महज 0.2 वर्ष का अंतर दिखाई दे रहा है, जिसे संबंधित रिपोर्ट के स्केल के अनुसार करीब दो महीने के बराबर बताया जा रहा है।

इसी तरह कामरान अली, कृष्ण कुमार और रुद्र शर्मा की बोन एज रेटिंग पिछले साल और इस साल दोनों में 16.2 वर्ष बताई गई है। इन आंकड़ों के सामने आने के बाद उम्र जांच के परिणामों के आकलन और अलग-अलग वर्षों की रिपोर्ट के तुलनात्मक परीक्षण को लेकर सवाल उठने लगे हैं।

हालांकि, बोन एज रेटिंग में बदलाव का वास्तविक उम्र से सीधा और सटीक संबंध मानना उचित नहीं है। इसके बावजूद, लगातार दो वर्षों की रिपोर्ट में समान या बेहद करीब आंकड़े सामने आने पर संबंधित परीक्षणों की पद्धति और रिपोर्ट के निष्कर्षों को स्पष्ट करना जरूरी हो जाता है।

आरव त्यागी की रिपोर्ट में अलग-अलग आंकड़े

आरव त्यागी का मामला भी उम्र निर्धारण प्रक्रिया को लेकर सवाल खड़े करता है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, पिछले साल उनकी फाइनल बोन एज रेटिंग 15.6 वर्ष बताई गई थी, जबकि इस साल के आंकड़ों में 16.2 और 16.6 वर्ष का उल्लेख सामने आया है।

ऐसे में यह स्पष्ट होना जरूरी है कि इस वर्ष उनकी कौन-सी रिपोर्ट अंतिम मानी गई, अलग-अलग आंकड़े किस आधार पर दर्ज हुए और खिलाड़ी की पात्रता तय करने में किस परिणाम को मान्य किया गया। संबंधित रिपोर्टों और परीक्षण के निष्कर्षों की आधिकारिक पुष्टि के बिना इन अंतरों के कारणों पर कोई अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

मशीनों से जांच के बाद कंसल्टेंट की भूमिका

बताया गया है कि पिछले साल तक खिलाड़ियों की उम्र की जांच मशीनों के माध्यम से कराई जाती थी, जबकि इस बार प्रक्रिया में अलग से कंसल्टेंट नियुक्त किए गए। यदि जांच की पद्धति या आकलन करने वाले विशेषज्ञों में बदलाव हुआ है, तो यह जानना महत्वपूर्ण है कि दोनों वर्षों के परिणामों की तुलना किन मानकों पर की गई।

क्या पुराने और नए परीक्षणों के बीच अंतर का वैज्ञानिक मूल्यांकन कराया गया? क्या रिपोर्ट में भिन्नता होने पर दोबारा परीक्षण या विशेषज्ञ समीक्षा की व्यवस्था है? क्या सभी खिलाड़ियों के लिए एकसमान प्रक्रिया अपनाई गई? इन सवालों के जवाब उम्र निर्धारण व्यवस्था की पारदर्शिता के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं।

पात्रता का सवाल, निष्पक्ष चयन की कसौटी

अंडर-16 क्रिकेट में आयु पात्रता का सीधा संबंध खिलाड़ियों के चयन और प्रतियोगिता की निष्पक्षता से है। निर्धारित आयु सीमा से अधिक उम्र पाए जाने पर खिलाड़ी संबंधित आयु वर्ग के लिए अयोग्य हो सकता है। ऐसे में उम्र की जांच में पारदर्शिता और एकसमान मानकों का पालन उन सभी खिलाड़ियों के हित में है, जो निर्धारित नियमों के तहत खेलने का अवसर चाहते हैं।

बोन एज टेस्ट से प्राप्त अनुमानित आयु को वास्तविक जन्मतिथि का सटीक विकल्प नहीं माना जा सकता। इसलिए केवल रिपोर्ट में दर्ज अंतर के आधार पर किसी खिलाड़ी या अधिकारी पर अनियमितता का आरोप लगाना उचित नहीं होगा। जरूरी है कि जांच की पद्धति, रिपोर्ट के निष्कर्ष और पात्रता निर्धारित करने के आधार को स्पष्ट किया जाए।

सवालों पर यूपीसीए की चुप्पी

रिपोर्ट में सामने आए आंकड़ों और जांच प्रक्रिया को लेकर उठ रहे सवालों के बीच यूपीसीए के पदाधिकारियों की ओर से स्पष्ट आधिकारिक जवाब सामने नहीं आने की बात भी चर्चा में है। कुछ पदाधिकारियों से स्पष्टीकरण मिलने की अपेक्षा के बावजूद स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकी है। ऐसे में एसोसिएशन की जिम्मेदारी बनती है कि वह संबंधित रिपोर्टों की स्थिति स्पष्ट करे और आंकड़ों में दिखाई दे रहे अंतर पर अपना पक्ष रखे।

जूनियर क्रिकेट की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए जरूरी है कि उम्र निर्धारण की प्रक्रिया संदेह और अस्पष्टता से मुक्त हो। बीसीसीआई और यूपीसीए की ओर से संबंधित रिपोर्टों की समीक्षा, परीक्षण के मानकों का विवरण और पात्रता तय करने की प्रक्रिया को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया जाना इस विवाद पर विराम लगाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। अब देखना यह है कि यूपीसीए इन सवालों पर कब तक आधिकारिक स्पष्टीकरण देता है।

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