थम गई ग्रीन पार्क की धड़कन, नहीं रहा पिच का जादूगर

 

 

  • वर्षों तक ग्रीनपार्क की पिच संवारने वाले शिव कुमार का निधन
  • जिस पिच को जीवन भर संवारा, उसी की गोद में ली अंतिम सांस

कानपुर, 3 फरवरी।

क्रिकेट सिर्फ बल्ला और गेंद का खेल नहीं होता। यह उन गुमनाम साधकों की तपस्या का भी नाम है, जो पर्दे के पीछे रहकर इतिहास रचते हैं। मंगलवार का दिन ग्रीन पार्क स्टेडियम के लिए ऐसा ही एक मनहूस दिन बन गया, जब पिच को जीवन देने वाले जादूगर शिव कुमार हमेशा-हमेशा के लिए खामोश हो गए।

जिस पिच की हर सांस, हर दरार और हर घास के तिनके को उन्होंने अपनी उंगलियों से महसूस किया, उसी पवित्र धरती पर पिच का मुआयना करते समय उन्हें दिल का दौरा पड़ा और भारतीय क्रिकेट ने अपना एक अनमोल रत्न खो दिया।

अंतिम यात्रा

करीबियों ने बताया कि निधन के बाद शिव कुमार के पार्थिव शरीर को उनके परिजन उनके पैतृक नगर बरेली ले गए, जहां बुधवार को उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा। शिव कुमार अपने पीछे धर्मपत्नी और दो बेटों को छोड़ गए हैं। 

जिस मिट्टी ने उन्हें गढ़ा, उसी मिट्टी में कल वे पंचतत्व में विलीन हो जाएंगे। उनके निधन की खबर सुनते ही बरेली से लेकर कानपुर तक शोक की लहर दौड़ गई। जब उनका पार्थिव शरीर ग्रीन पार्क से बाहर ले जाया गया, तो वहां मौजूद हर कर्मचारी, हर ग्राउंड्समैन और हर खिलाड़ी की आंखें नम थीं। ग्रीन पार्क के हर कोने में सन्नाटा पसरा है, मानो मैदान खुद अपने संरक्षक को याद कर रहा हो।

मिट्टी से मोह और बेमिसाल साधना

शिव कुमार उन विरले लोगों में थे, जिन्होंने पिच निर्माण को महज़ तकनीक नहीं, बल्कि साधना बनाया। जब बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड की ओर से बेहतर भविष्य और मोटी तनख्वाह का प्रस्ताव आया, तब उन्होंने उसे ठुकरा दिया। ग्रीन पार्क उनके लिए नौकरी नहीं, घर था। यहां की हर विकेट, हर स्ट्रिप उनके दिल के बेहद करीब थी।

शून्य से शिखर तक का सफर

एक साधारण कर्मचारी से अंतरराष्ट्रीय स्तर के क्यूरेटर बनने तक का उनका सफर हर खिलाड़ी और खेलकर्मी के लिए प्रेरणा है। उनकी तैयार की गई पिचों पर सचिन तेंदुलकर, विराट कोहली जैसे दिग्गजों ने रन बरसाए। तालियां बल्लेबाजों को मिलीं, लेकिन उन तालियों की गूंज में शिव कुमार की मेहनत भी शामिल थी बिना किसी शोर के, बिना किसी श्रेय की मांग के।

एक युग का अंत

अब ग्रीन पार्क की फिजाओं में वह जानी-पहचानी आवाज नहीं गूंजेगी, जो कहती थी इस विकेट को थोड़ा और सांस लेने दो। कल बरेली में जब उनकी देह पंचतत्व में विलीन होगी, तब भारतीय क्रिकेट एक ऐसे सिपाही को अंतिम विदाई देगा, जिसने कभी सुर्खियां नहीं चाहीं, बस चाहता था कि खेल ईमानदारी से खेला जाए।

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